रामनवमी के उपलक्ष्य पर नाट्य मंचन

कार्यक्रम विषय- ‘मर्यादापुरुषोत्तम राम’

दिनांक- रविवार, 17 अप्रैल 2016

संयोजन- केसी क्लब एवं शब्दम्

प्रस्तुति- युवक मंगल दल

स्थान- हिन्द लैम्प्स परिसर स्थित संस्कृति भवन, लॉन

भारतीय संस्कृति राममय है। महाकवियों ने राम के जीवन का चित्रण करते हुए, राम को विभिन्न परिस्थितियों में प्रस्तुत करते हुए एक मॉडल जीवन का आदर्श प्रस्तुत किया है।

‘रामायण’ और ‘रामचरित मानस’ हमारे पारिवारिक और सामाजिक ही नहीं, राजनैतिक जीवन का संविधान बन चुके हैं। आज का भारत सदियों तक रामायण सुनकर, पढ़कर, रामलीला का आयोजन कर अपने आदर्शों और जीवनमूल्यों का निर्माण कर सका है।

राम ने हमें सिखाया परिवार में, समाज में, सुख दःख में कैसे जीवन जिया जाता है। रामायण ने हमें सौन्दर्य पर मुग्ध होना सिखाया, त्याग की महत्ता समझायी, स्वार्थ से ऊपर उठने का संदेश दिया, संकुचित जीवन का तिरस्कार कर उदार जीवन जीना सिखाया। कर्तव्य और अकर्तव्य का बोध कराया, जीवन में हम जिन पात्रों के सम्पर्क में आते हैं, उनसे व्यवहार करना रामायण ने सिखाया। सच तो ये है कि हर भारतीय राम के परिवार का सदस्य होता है। वह केवल अच्छाइयों से प्रेम करना ही नहीं सीखता बल्कि बुराइयों से घृणा करना भी सीखता है। हम सब रामायण की पाठशाला के छात्र हैं। हमारे संस्कार रामायण की देन हैं।

उपर्युक्त उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए शब्दम् एवं केसी क्लब के संयुक्त तत्त्वावधान में ‘मर्यादापुरुषोत्तम राम’ एक नाट्य मंचन का आयोजन स्थानीय युवक मंगल दल निजामपुर गढ़ूमा द्वारा किया गया तथा राम के मर्यादापुरुषोत्तम चरित्र एवं केवट का प्रसंग दिखाया गया।

युवक मंगल दल के कलाकारों ने केवट प्रसंग के अंतर्गत दिखाया, भगवान राम जैसे ही गंगा नदी के किनारे पहुंचे, वहां पर निषादराज केवट अपनी नाव के साथ खडे़ थे। केवट को जैसे ही पता चला कि तीनों लोक के तारण हार आज मेरी नाव में बैठने वाले हैं, उन्होंने प्रभु राम से हाथ जोड़कर मना कर दिया। केवट ने कहा, ‘हे प्रभु आपके चरणों की रज से एक शिला, सुन्दर नारी बन गई। मेरी तो एक काठ की नाव है, यह मेरा रोजगार है अगर यह नारी बन गई तो मेरा क्या होगा। प्रभु हँसने लगे। और केवट के मन में जो भावना थी वह केवट ने प्रभु राम के आगे रखते हुए कहा कि ‘हे प्रभु यदि आप अपने चरण मुझसे धुलवालें तो मैं आपको यह तट पार करा सकता हूँ।’ प्रभु राम का मौन, केवट का मन पढ़ रहा था। प्रभु राम ने केवट को मुस्कराते हुए कहा कि हे केवट जो तुम्हारे मन में है वह इच्छा पूर्ण कर लो और केवट प्रभु राम के चरण धोने के बाद श्रीराम को अपनी नाव में बैठाकर धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे।

बाॅलीवुड की संस्कृति के उपरान्त भी गाव में आज भी राम लीला की संस्कृति नजर आती है। जो संस्थाएं/ग्राम समिति इस प्रकार के आयोजन करती है या कराती है, इन्हें समाज का पूरा संरक्षण मिलना चाहिए ताकि यह संस्कृति जीवित रह सके।

कैकई, मंथरा संवाद।

केवट संवाद।

नाट्य मंचन टीम का समूह छायांकन।

 

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