बालिका&महिला पाठशाला & एक चुनौती

मदीना छोटी&छोटी लकडियों को बीनकर घर लाती थी। माँ उन लकड़ियों की आंच पर रोज का खाना बनाती थी। लगभग 2 से 3 घण्टें तक बीनी गई लकड़ियों से बना खाना मदीना के परिवार को एक अलग मिठास देता था] पर मदीना के जीवन में एक कडवाहट भी थी। उसका बचपन इन लकड़ियों के कांटों में ही खो गया था। किताब पर लिखे हुए अक्षर उसके लिए काली स्याही से ज्यादा कुछ नहीं थे। बचपन में मदीना स्कूल गई तो उसका मन नहीं लगा। घरवालों ने भी कभी पढाई के लिए उसपर जोर नहीं दिया और आज जब उसे पढाई का महत्व समझ में आया] तो वह कहां पढ़े] कैसे पढे़ जैसे प्रश्न उसके सामने हैं। उम्र अधिक होने के कारण अब वह स्कूल भी नहीं जा सकती है।

यह केवल एक मदीना की कहानी नहीं है। हमारे मध्य अंसख्य ‘मदीना’ आज निरक्षर हैं] पढ़ना चाहती हैं] पर उचित अवसर न होने के कारण वह पढ़ नहीं पाती हैं।

ऐसे एक गाव (नगला डेरा) के विषय में ग्राम प्रधान भानेश जी से शब्दम् टीम को पता चला। शब्दम् टीम ने नगला डेरा गांव का सर्वे किया] सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार-

उपरोक्त सर्वे के निष्कर्षों के पश्चात् शब्दम् संस्था ने 1 मई 2015 को ग्राम नगला डेरा में बालिका-महिला पाठशाला खोलने का निर्णय लिया। बालिका महिला पाठशाला प्रारम्भ करते समय गांव के लोग बहुत ज्यादा उत्साहित नहीं थे] पर संस्था के कार्यकर्ताओं द्वारा समय-समय पर ग्राम प्रधान भानेश जी को साथ लेकर गांव के लोगों से बात की गई। उन्हें साक्षर होने का महत्व बताया। वर्तमान में भी स्थिति बहुत उत्साहजनक नहीं है] परन्तु जो आठ-दस महिलाएं लगातार बालिका-महिला पाठशाला में आ रही हैं] आज वे कई सरकारी कागजों पर अगूंठे लगाने की जगह बड़े गर्व से अपना नाम लिखती हैं।

नगला डेरा गांव से उत्साहित होते हुए करीब 5 किलोमीटर दूर नगला चांट गाव में भी शब्दम् ने बालिका-महिला पाठशाला प्रारम्भ की और महिलाओं को साक्षर बनाने की दिशा में एक कदम और बढ़ाया।

फोटो परिचय-

पाठशाला में उपस्थित बालिकाएँ।

पाठशाला में उपस्थित महिलाएँ।

प्रशिक्षण देती शिक्षिका।

पढ़ाई की शुरुआत करतीं महिलाएँ व बालिकाएँ।

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